Thursday, August 15, 2013

जन्म दिन

पिचहत्तर के प्राण

भारतीय कार्टून कॉमिक जगत के ‘सरपंच’ कार्टूनिस्ट प्राण
जन्म १५ अगस्त, १९३८
  ‘कार्टून न्यूज़ हिन्दी’ की ओर से कार्टूनिस्ट प्राण को बहुत-बहुत बधाई!                                    

प्राण
प्राण कुमार शर्मा  जिन्हें  दुनिया कार्टूनिस्ट प्राण के नाम से जानती है, का जन्म १५ अगस्त, १९३८ को कसूर नामक कस्बे में हुआ था जो अब पाकिस्तान में है। एम.ए. (राजनीति शास्त्र) और फ़ाइन आर्ट्स के अध्ययन के बाद सन १९६० से दैनिक मिलाप से उनका कैरियार आरम्भ हुआ। तब हमारे यहां विदेशी कॉमिक्स का ह्री बोल्बाला था। ऐसे में प्राण ने भारतीय पात्रों की रचना करके स्थानीय विषयों पर कॉमिक बनाना शुरू किया।
भारतीय कॉमिक जगत के सबसे सफल और लोकप्रिय रचयिता कार्टूनिस्ट प्राण ने  सन १९६० से कार्टून बनाने की शुरुआत की। उनके रचे अधिकांश पात्र लोकप्रिय हैं पर प्राण को सर्वाधिक लोकप्रिय उनके पात्र चाचा चौधरी और साबू ने ही बनाया।
अमरीका के इण्टरनेशनल म्यूज़ियम ऑफ़ कार्टून आर्ट में उनकी बनाई कार्टून स्ट्रिप ‘चाचा चौधरी’ को स्थाई रूप से रखा गया है। सन १९८३ में  देश की  एकता को लेकर उनके द्वारा बनाई गयी कॉमिक ‘रमन- हम एक हैं’ का विमोचन तत्कालीन प्रधान मन्त्री स्व. इन्दिरा गांधी ने किया था।
एक जमाने में काफ़ी लोकप्रिय रही पत्रिका लोटपोट के लिए बनाये उनके कई कार्टून पात्र काफ़ी लोकप्रिय हुए। बाद में कार्टूनिस्ट प्राण ने चाचा चौधरी और साबू को केन्द्र में रखकर स्वतंत्र कॉमिक पत्रिकाएं भी प्रकाशित कीं। बड़े से बड़ा अपराधी या छोटा-मोटा गुन्डा-बदमाश या जेब कतरा, कुत्ते के साथ घूमने वाले लाल पगड़ी वाले बूढ़े को कौन नहीं जानता! यह सफ़ेद मूंछों वाला बूढ़ा आदमी चाचा चौधरी है। उसकी लाल पगड़ी भारतीयता की पहचान है। कभी-कभी पगड़ी बदमाशों  को पकड़ने के काम भी आती है।
कहते हैं कि चाचा चौधरी का दिमाग कम्प्यूटर से भी तेज चलता है। सो अपने तेज दिमाग की सहायता से चाचा चौधरी बड़े से बड़े अपराधियों को भी धूल चटाने में माहिर हैं। चाचा चौधरी की रचना चाणक्य के आधार की गयी है जो बहुत बुद्धिमान व्यक्ति थे। यह १९६० की बात है। दरअसल वे पश्चिम के लोकप्रिय पात्रों सुपरमैन, बैटमैन, स्पाइडरमैन आदि से  अलग हटकर भारतीय छाप वाले पात्रों की रचना करना चाहते थे जो दिखने में सामान्य इन्सान दिखें। इसीलिए काफ़ी सोचविचार के बाद  उन्होने सामान्य से दिखने वाले गंजे, छोटे कद के, बूढ़े चाचा चौधरी को बनाया, जिसका दिमाग बहुत तेज था। वह अपने दिमाग से हर समस्या का हल कर देता है। चाचा चौधरी स्वयं शक्तिशाली नहीं पर जुपिटर ग्रह से आया साबू अपनी असाधारण शारीरिक क्षमता से चाचा चौधरी पर्छाईं की तरह उनके साथ रहकर यह कमी पूरी कर देता है। इस तरह  साबू और चाचा चौधरी मिल कर अपराधियों को पकड़वा देते है।

चीकू नामक बुद्धिमान खरगोश का कॉमिक बच्चों की पत्रिका चम्पक में बरसों छपा। किसी वजह से सन १९८० में चम्पक से अलग होने पर चीकू के कारनामे बदल गये। बाद में यह २ पृष्ठीय चित्रकथा चीकू दास (एक सरकारी चित्रकार) ने बनायी। इसी तरह कुछ अन्य पात्रों के साथ भी हुआ। विभिन्न हिन्दी व अन्य भाषाओं के समाचार पत्र-पत्रिकाओं में उनके अनेक पात्र धूम मचाते रहे हैं। उनके रचे बिल्लू, पिन्की, तोषी, गब्दू, बजरंगी पहलवान, छक्कन, जोजी, ताऊजी, गोबर गणेश, चम्पू, भीखू, शान्तू आदि तमाम पात्र जनमानस में सालों से बसे हुए हैं।
चाचा चौधरी की कॉमिक्स हिन्दी, अंग्रेजी के अलावा अन्य भारतीय भाषाओ मे भी प्रकाशित की होती है। हास्य और रोमांच से भरे ये कॉमिक बच्चों और बड़ों का भरपूर मनोरंजन करते है। दर्शकों का चाचा चौधरी  के टीवी सीरियल ने भी पर्याप्त मनोरंजन किया। कार्टूनिस्ट प्राण एनिमेशन फिल्म भी बना रहे है।
सचमुच भारतीय कार्टून कॉमिक जगत के ‘सरपंच’ कार्टूनिस्ट प्राण ही हैं।
टी.सी. चन्दर

कवि -कार्टूनिस्ट प्राण के रेखांकन
कंप्यूटर से भी तेज दिमाग वाले 'चाचा चौधरी' तथा साबू, बिन्नी, डगडग, बंदूक सिंह, राकेट, श्रीमतीजी, बिल्लू, पिंकी, रमन, डब्बू, चन्नी चाची जैसे कार्टून चरित्रों के रचनाकार प्राण ने अपने कार्टूनों से भारतीय बचपन को एक नये अंदाज में संवारा है। ऐसे में जब भारतीय साहित्य और समाज एक दूसरे से दूर जाने की जिद पकड़ने की शुरूआत-सी कर रहे थे तब राजनीति विज्ञान में एम.ए.और बंबई के अतिप्रतिष्ठित जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट से पढ़े तथा दैनिक 'मिलाप' से जुड़े रहे युवा चित्रकार प्राण ने वर्ष १९६६ के पहले दो दिनों में दिल्ली से दूर खंडवा जाकर 'एक भारतीय आत्मा' नाम से कवितायें लिखने वाले 'दादा' माखन लाल चतुर्वेदी के कुछ रेखांकन बनाए थे जो प्रकाशन विभाग की मासिक पत्रिका 'आजकल' ( हिन्दी ) के अक्टूबर १९६६ अंक में  उनके एक संस्मरणात्मक आलेख के साथ प्रकाशित हुए थे . इस आलेख में प्राण एक संवेदनशील  गद्य लेखक की तमाम खूबियों के साथ  मौजूद हैं।
'पुष्प की अभिलाषा' शीर्षक कविता को हिन्दी की  कालजयी कविताओं की श्रेणी में गिना जाता है। माखन लाल चतुर्वेदी (१८८९ - १९६८) न केवल हिन्दी की राष्ट्रीय काव्यधारा के प्रमुख कवि रहे हैं बल्कि एक पत्रकार के रूप में  भी उनका कद बहुत बड़ा है।'कृष्णार्जुन युद्ध ,'हिमकिरीटनी', 'हिमतरंगिणी', 'माता', 'साहित्य देवता', 'युगचरण' 'समर्पण', 'वेणु लो गूंजे धरा', 'अमीर इरादे:गरीब इरादे' जैसी रचनाओं के इस रचनाकार ने एक समय में 'प्रभा','कर्मवीर','प्रताप'जैसे पत्रों का  सफल संपादन भी  किया था।
* पूर्व उल्लिखित  'आजकल' के अक्टूबर १९६६ अंक से  कार्टूनिस्ट  प्राण  के संस्मरण के  कुछ चुनिंदा अंशों के साथ   'एक भारतीय आत्मा' की जीवन संध्या  के स्केच भी  पूरे  आदर - आभार सहित प्रस्तुत  किए  जा रहे हैं -
भारतीय आत्मा के साथ एक चित्रकार के दो दिन
• १ जनवरी,१९६६
भारतीय आत्मा को देखते ही सबसे पहले जो विचार मेरे मन में आया, वह यह था कि यह चेहरा बहुत सरल है, देखने में भी और चित्र बनाने के लिये भी।शायद मैंने पहले कभी इतना सरल और भावुक चेहरा स्केच नहीं किया था. हां, अंधकारमय कमरा, जिसमें श्री माखन लाल चतुर्वेदी, अर्थात मेरे माडल लेटे हुए थे, जरूर मेरे कार्य में बाधक था। बताया गया कि मेरे माडल बहुत सख्त बीमार हैं और उन्हें रोशनी अच्छी नहीं लगती। इस कारण मैं कमरे में बिजली भी नहीं जला सकता। मेरे मॉडल, जिन्हें लोग प्यार से 'दादा' कहते हैं, पिछले दो वर्षों से इतने अधिक बीमार हैं कि बैठ भी नहीं सकते।पिछले सारे मेरे माडलों से यह माडल अजीब था। उसको एक 'पोजीशन' बनाकर बैठे या खड़े रहने के लिए आर्टिस्ट नहीं कह सकता था, बल्कि लेटे हुए माडल की सुविधा का ख्याल रखकर ही उसको चित्र बनाना था। चित्र बनाने में ये रुकावटें सामने थीं. परंतु उसका भोला और सरल चेहरा देखकर कोई भी चित्रकार, इतनी रुकावटें होते हुए भी, उसका चित्र बनाने को तैयार हो जाएगा. यही मैंने भी किया।
"आपकी तबियत अब कैसी है?" मैंने अपने बीमार माडल से पूछा।
"ठी-ड़-ड़-ड़-...र-र-र..." मेरे माडल के होंठों पर कंपन हुआ और अस्पष्ट ध्वनि हुई.पास खड़े हुए उनके छोटे भाई साहब ने बताया कि वह पिछले दो वर्षों से ठीक से बोल नहीं पाते। बहुत कोशिश करने पर जब वह कुछ बोलते हैं, तो वह इतना अस्पष्ट होता है कि उसे उनका नौकर या छोटे भाई ही समझ पाते हैं। अपने मॉडल की यह हालत देखकर मेरा दिल रो उठा कि किसी जमाने में आग की लपटें बरसाने वाली क्रांतिकारी कवितायें लिखने वाला आज असहाय होकर बूढ़े शेर की तरह अंधकारमय मांद में पड़ा है।
कमरे में एक कोने में बैठकर मैंने चित्र बनाना शुरू किया. सामने मेरे माडल रजाई ओढे लेटे हुए थे.रंग कागज पर फैलने लगे. अभी कुछ ही देर हुई थी कि उन्होंने करवट बदली. मुझे एक और रुकावट दिखी. माडल को एक ही तरफ से लेटा रहने के लिए भी नहीं कहा जा सकता था. वह बीमार थे.इस कारण एक करवट लेटे रहना उनके लिए असह्य था. वह सुविधानुसार दायें-बायें करवटें बदलते रहे. कई बार उनका चेहरा छुप जाता. मैंने आंखें बंद कीं और दिमाग खोला. सोचा, यह पेंटिंग कैसी हो? इसमें कवि के भाव होने चाहिए. कौन-सी कविता? हां ठीक है, वही, जो मैंने बचपन में पढ़ी थी -'मील का पत्थर'. यह कवि भी तो सारी उम्र एक राहगीर रहा है. मैंने फिर रंगों को कागज पर फैलाना शुरू किया. माडल की तरफ देखा. बंद आंखें, साफ़ निर्मल चेहरा, निर्मल जल की तरह, जिसमें झांककर आप दिल के भाव तक देख सकते हैं, श्वेत वर्ण, पतली नाक, नुकीली ठुड्डी घनी सफेद मूंछें और रूई के समान सिर पर घने बाल. उनका जरूर जवानी में सुंदर व्यक्तित्व रहा होगा, मैंने सोचा. कुछ और चेहरे के अंदर घुसा,झुर्रियों के बीच मैंने खोजा, उनके मन में संतुष्ट भाव. मैं उनके चेहरे के हर भाग को खोजता रहा, अध्ययन करता रहा, भाव ढ़ूंढ़ता रहा. ब्रश चलते रहे ,रंग कागज पर चलते रहे , चित्र बनता रहा।
"आप चित्रकला के बारे में कुछ कहना चाहते हैं?"
"चित्र ...त्र...त्र...भ...भ...श्...श..." ( चित्रकला भावों से शुरू होती है।)
"और "...मैंने पूछा।
"भ...भ...भ...प...र...र...र..." ( और भावों पर खत्म हो जाती है )
मैं मुस्करा दिया। मेरे मॉडल ने दो वाक्यों में ही सारी चित्रकला को लपेट लिया था। मैंने चित्र पूरा कर लिया। ऊपर बायें कोने पर 'मील का पत्थर', बीच में मुख्य फिगर कवि , मेरे माडल और नीचे एक युवक, जो पूरे जोश में हाथ उठाये क्षितिज की ओर चला जा रहा है। चित्र माडल को दिखाया गया। उन्होंने जेब से चश्मा निकाला, रूमाल से उसे पोंछा और आंखों पर चढ़ाया। चित्र को गौर से देखा. उनके होंठ थोड़े चौड़े हो गए, वह मुस्कुराये.मैंने समझ लिया कि चित्र उन्हें पसंद आ गया है. स्वीकृति में उन्होंने सिर भी हिलाया। फिर उन्होंने 'मील का पत्थर' की ओर इशारा किया। मैं समझ गया कि वह ७८ के अंकों को, जो 'मील का पत्थर' पर अंकित है, पूछ रहे हैं। मैंने कहा- आपको पथिक बनाया है, 'मील का पत्थर' पर ७८ अंक लिखकर यह बताने की कोशिश की है कि आपने अपने जीवन का इतना रास्ता तय कर लिया है। यह सुनकर मेरे मॉडल फिर मुस्कुराये।
• २ जनवरी, १९६६
आज मैंने अपने मॉडल की दिनचर्या पर छोटे-छोटे ब्लैक एंड ह्वाइट स्कैच बनाने का विचार किया।
सुबह मेरे माडल दस मिनट तक अपने मकान के आगे सैर करते हैं.सुबह साढ़े नौ बजे के करीब वह काला चश्मा लगाए बाहर आए. पांवों मे मोजों पर काले जूते, खादी का पाजामा, बंद गले का कोट, गले पर मफलर, सिर पर गांधी टोपी और सिर से कानों तथा गर्दन को लपेटे हुए दोहरी अथवा चौहरी शाल थी. एक व्यक्ति उनको थामे हुए था। उन्होंने धीरे-धीरे, इंच-इंच करके एक-एक कदम आगे बढ़ाया, फिर ठहर गए। फिर धीरे-धीरे, इंच-इंच करके दूसरा कदम बढ़ाया, फिर ठहर गए। इसी प्रकार वह कठिनाई से धीरे-धीरे आगे एक कदम बढ़ाते, फिर दूसरा। उन्होंने कोई दस गज की दूरी तय की। फिर वापस उसी तरह कदम रखते वही दूरी तय की। यही दस गज की जगह मात्र उनकी सैरगाह थी. मैंने स्केच-बुक उठाई और उनके साथ, उनके आगे-आगे, उलटे पांव चलने लगा और स्केच बनाने लगा। बायें हाथ से स्केच-बुक थामे, दायें से मैं रेखाएं बनाता जाता। जब मेरे माडल मुड़ जाते तो मैं भी मुड़ जाता। एक बार जब मैं उनके आगे-आगे स्केच बनाता हुआ उल्टे पांव चल रहा था तो पीछे एक बड़ा पत्थर आ गया। मैं धड़ाम से गिर पड़ा. पास खड़े हुए बच्चे हंसने लगे। मैं कपड़े झाड़कर उठा। यह स्केच मैंने पांच मिनट में पूरा कर लिया।
"स...स...र...र..."(क्या सारे चित्र बन गए?)
"हां, काफी बन गये हैं।"
"को...ई...ई...क...क...क...?" (कोई कार्टून?)
"कार्टून सिर्फ राजनीतिज्ञों के बनाता हूं।आपका कोई कार्टून नहीं बनाऊंगा,बेफिक्र रहिए।"
कार्टूनिस्ट प्राण


इस पर मेरे माडल खिलखिलाकर हंस पड़े। पास बैठे हुए उनके भाई ने बताया कि आज बहुत अरसे बाद वह हंसे हैं.मैंने अपने को सराहा कि उन्हें हंसा पाया हूं। मेरे माडल का मूड अच्छा देखकर एक सज्जन ने मौका हाथ से न जाने दिया।
"दादा, अब तो इनको हस्ताक्षर दे दो। "मेरे माडल ने स्वीकृति दे दी। उन्हॅं सहारा देकर बैठाया गया। फिर उनके हाथ में पेन दे दिया गया। उन्होंने अनजाने में ही जहां कलम पड़ गई, अस्पष्ट-से,टेढे-मेढे हस्ताक्षर करने शुरू कर दिये। किसी स्केच पर पूरा नाम लिखने की कोशिश की, परंतु 'माख लाल च'...तक ही लिख सके.किसी पर सिर्फ 'म.ल.च' ही अंकित कर सके।
३ जनवरी १९६६
आज सुबह मैंने अपने मॉडल के चरण छुए और उनसे विदा ली। सुबह नौ बजे खंडवा से पठानकोट एक्सप्रेस में बैठकर दिल्ली रवाना हो गया.
(साभार) कर्मनाशा में सिद्धेश्वर सिंह
लिन्क: http://karmnasha.blogspot.in/2011/04/blog-post.html




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Tuesday, June 4, 2013

Hospital to home

1. Drawing cartoon from ventilator bed-I
Cartoonist TC Chander drawing cartoon from his ventilator bed, while he was admitted at Sant Paramanand Hospital, Civil Lines in Delhi. 
(19th May, 2013, 04 47 46 pm)
2. Drawing cartoon from ventilator bed-II
Cartoonist T C Chander drawing cartoon from his ventilator bed, while he was admitted at Sant Paramanand Hospital in Delhi.
(19th May, 2013, 04 50 32 pm)

Hospital to home 
May 17-24, 2013

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Thursday, November 4, 2010

शुभ दीपावली

दिवाली धूम





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Monday, December 28, 2009

कार्टूनिस्ट सम्मानित

कार्टूनिस्ट चन्दर सम्मानित

हाल ही में कार्टूनिस्ट चन्दर को पं. मदन मोहन मालवीय जयंती के उपलक्ष में अंशकालिक पत्रकार प्रोत्साहन पुरस्कार समारोह में ‘सर्वश्रेष्ठ कार्टूनिस्ट’ के रूप में सम्मानित किया गया। गुरुवार, 24 दिसम्बर 2009 को ग़ाजियाबाद स्थित मेवाड़ इंस्टीट्यूट में पं. मदन मोहन मालवीय जयंती के उपलक्ष में अंशकालिक पत्रकार प्रोत्साहन पुरस्कार समारोह आयोजित हुआ। सरस्वती माँ के समक्ष मुख्य अतिथि माननीय डॉ. भीष्म नारायण सिंह द्वारा दीप प्रज्ज्वलन एवं मालवीय जी की प्रतिमा पर माल्यार्पण के बाद मालवीय जयन्ती का कार्यक्रम प्रारम्भ हुआ। मेवाड़ संस्थान के अध्यक्ष अशोक कुमार गदिया ने संस्थान की ओर से मुख्य अतिथि डॉ. भीष्म नारायण सिंह व सभी सम्मानित अतिथियों का हार्दिक अभिनन्दन करते हुए इस अवसर पर पुरस्कार पाने वाले पत्रकारों को हार्दिक बधाई दी। उन्होंने कहा कि महामना मदन मोहन मालवीय विशिष्ट व्यक्तित्व के धनी थे, उनके जीवन को पढ़ने पर लगता है कि वे आदर्श विद्यार्थी, पुत्र, पति, देश भक्त पत्रकार, वकील, कवि एवं कुशल राजनीतिज्ञ थे। वे शिक्षा के क्षेत्र में युगदृष्टा थे जिन्होंने 1916 में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय की कल्पना की और उसको मू्र्त रूप दिया। दान और सहयोग प्राप्त करने में उनके मुकाबले में आजतक कोई व्यक्ति नहीं हुआ। वरिष्ठ पत्रकार और इंडिया टुडे पत्रिका के कार्यकारी सम्पादक जगदीश उपासने, जानेमाने कार्टूनिस्ट काक (हरीश चन्द्र शुक्ला ‘काक’) एवम् श्री रवीन्द्र त्रिपाठी की 3 सदस्यीय चयन समिति के निर्णय के अनुसार मुख्य अतिथि माननीय डॉ. भीष्म नारायण सिंह (पूर्व राज्यपाल-तमिलनाडु एवं असम) आशीश मणि त्रिपाठी (संवाददाता-हिन्दी), मनोज सिन्हा ( संवाददाता-अंग्रेजी), उमेश चतुर्वेदी (फीचर लेखक) और चन्दर/टी.सी. चन्दर (कार्टूनिस्ट) को सम्मानित किया गया। सभी को 5100.00 रुपये नकद राशि, शॉल, प्रशस्ति पत्र और मेवाड़ इंस्टीट्यूट का प्रतीक चिन्ह प्रदान किये। यह कार्यक्रम वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय की प्रेरणा और सहयोग से आयोजित किया गया। मुख्य अतिथि डॉ. भीष्म नारायण सिंह ने महामना के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि मालवीय जी विलक्षण प्रतिभा के धनी थे। मालवीय जी के जीवन से हमें शिक्षा लेनी चाहिए कि निःस्वार्थ रूप से हम परमार्थ कारण के लिए संलग्न रहें। वह एक महान कर्मयोगी थे। उनमें विलक्षण प्रतिभा थी। उसी प्रतिभा के आधार पर उन्होंने एक महान विश्वविद्यालय की स्थापना की जो आज उनकी स्मृति का श्रेष्ठ उदाहरण है। उनकी पत्रकारिता आज भी हमें प्रेरित करती है कि हम देश प्रेम और सेवा के लिए कार्यरत रहें। जगदीश उपासने ने अपने सम्बोधन में कहा कि पत्रकारिता को नयी तकनीक तेजी से प्रभावित कर रही है। बदलते दौर में तकनीक का रोल लगातार महत्वपूर्ण होता जा रहा है। अब पत्रकारिता बड़े निवेश का विषय हो गया है। इसलिए कई बार लोंगो को यह शिकायत होती है कि पत्रकार पूरी ईमानदारी से पत्रकारिता नहीं कर रहा है। शिकायत करने वाले ऐसे लोगों को समझना चाहिए कि अब पत्रकारिता में पूँजी का रोल बढ़ गया है। फिर भी मनुष्य पत्रकारिता के केन्द्र में हमेशा से रहा है और हमेशा बना रहेगा। कार्यक्रम संचालन शिक्षा शास्त्र विभाग की प्राध्यापिका सुश्री मुग्धा आनंद ने किया।
 


1. श्रोता: कार्टूनिस्ट चन्दर और कार्टूनिस्ट काक, 2. दो शब्द: कार्टूनिस्ट चन्दर , 3. फ़ुर्सत: कार्टूनिस्ट काक, कार्टूनिस्ट चन्दर और पत्रकार सन्जय तिवारी, 4. पति-पत्नी: मन्जू गोपालन और चन्दर

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Thursday, October 29, 2009

कार्टून चोर टीवी चैनल सीएनईबी


हिन्दी टीवी चैनल सीएनईबी द्वारा कार्टूनों की चोरी


साधन सम्पन्न हिन्दी समाचार टीवी चैनल सीएनईबी ने अलग-अलग ब्लॉगों पर प्रदर्शित मेरे कार्टूनों में से ५ कार्टून उड़ा लिए और मनमाने ढंग से उनमें बड़ी बेशर्मी के साथ फ़ेरबदल भी कर डाला। उल्लेखनीय है कि इसके लिए हिन्दी समाचार टीवी चैनल सीएनईबी ने मुझे किसी प्रकार की जानकारी या सूचना देना भी ठीक नहीं समझा, उपयोग के लिए पूर्वानुमति लेना तो बहुत दूर की बात है। बाप का माल जो समझा! यहां दिए चित्र को देखने से सहज ही अनुमान हो जाता है कि मुफ़्त के माल से किस प्रकार सज्जा करने का आनन्द लिया गया है।
इन कार्टूनों के बारे मैं जब मुझे पता लगा तो मैंने हिन्दी समाचार टीवी चैनल सीएनईबी के मुखिया और जानेमाने पत्रकार श्री राहुलदेव से फ़ोन पर सम्पर्क कर अपनी बात कही और उन्हें इस बारे में उनके ई-मेल पर विवरण भी भेज दिया। कई बार स्मरण संदेश भेजने पर भी उनकी ओर से मुझे कोई प्रतिक्रिया प्राप्त नही हुई। शायद उन्होंने प्रतिक्रिया देना उचित नहीं समझा या शायद उन्हें इसकी आदत ही नही है।
हिन्दी समाचार टीवी चैनल सीएनईबी की इस हरकत ने एक रचनाकार यानी कार्टूनिस्ट चन्दर के अधिकारों और कॉपीराइट का जिस बेशर्मी से हनन किया है, वह शर्मनाक है।

चित्र: (बांये) कार्टूनिस्ट चन्दर और (दांये) वरिष्ट पत्रकार श्री राहुल देव
यहां ऊपर दिए चित्र को आप चाहें तो उस पर क्लिक करके बड़ा करके भी देख सकते हैं।

आवश्यक हो तो कार्टूनिस्ट चन्दर से सम्पर्क करें: tcchander@gmail.com    cartoonistchander@gmail.com  फ़ोन ०-९८९१०८४७०७ (9891084707)
अन्य ब्लॉग (देखने के लिए उस पर क्लिक करें): कार्टूनिस्ट चन्दर, कार्टून इंस्टीट्यूट, कार्टूनकाल, टूनकाल, कार्टूनपन्ना (सुलेखा.कॉम), मुस्कानदूत
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Wednesday, July 15, 2009

सावधान

कंप्यूटर के निरंतर उपयोग से भी बढ़ती है परेशानी

विभिन्न आयु वर्ग के बच्चे कंप्यूटर के आगे मॉनीटर की स्क्रीन पर आंखें गड़ाए अपनी पसंद के गेम खेलते रहते हैं, कार्टून या एनीमेश फिल्में देखते रहते हैं या फिर अन्य कार्य करते रहते हैं। उनका बचपन आज कंप्यूटर के हवाले हो गया है। घर हो या स्कूल, बच्चों को बाह्य और आंतरिक रूप से कंप्यूटर ने बच्चों के व्यतित्व और दिनचर्या को बदलकर रख दिया है।



सुविधाजनक, आसान, समय बचाऊ आधुनिक उपयोगी तकनीक जल्दी ही लोकप्रिय हो जाती है भले ही उसमें कुछ कमियां हों या कुछ लोग उसकी आलोचना करते हों। आज की भागमभाग वाले जीवन में कंप्यूटर ने अपना खास स्थान बना लिया है, इतना खास कि अब लगभग हर क्षेत्र में कंप्यूटर की सहायता के बिना कार्य संपन्न हो पाना असम्भव सा माना जा सकता है। जो लोग कभी कंप्यूटर के नाम से ही नाक-भौं सिकोड़ा करते थे उनमें से अधिकांश कंप्यूटर की कार्यप्रणाली जानने-सीखने के इच्छुक हैं। यही नहीं ऐसे तमाम लोग अब कंप्यूटर का उपयोग करने के अभ्यस्त भी हो गए हैं।

कम्यूटर का निरंतर घंटों या रातदिन उपयोग करने वालों की भी कमी नहीं है। दिनप्रतिदिन कंप्यूटर पर हमारी निजी और व्यावसायिक निर्भरता बढ़ती ही जा रही है। यह आवश्यकता हो या मजबूरी, निःसंदेह अंततः घाटे का सौदा ही सिद्ध होगा। आधुनिक तकनीक जहां विभिन्न रूपों में अपनी उपयोगिता सिद्ध करती है वहीं उसकी कुछ कमियां या बुराइयां भी सामने आती हैं। यह स्थिति तब अधिक घातक होती है जब बिना सावधानी बरते अधिकतम लाभ प्राप्त करने के लिए निरंतर एक धुन के अधीन कार्य किया जाता है। निजी या व्यावसायिक या कार्यालय आदि के विभिन्न कार्यों के लिए कंप्यूटर का आज जमकर उपयोग किया जा रहा है इससे कंप्यूटर एडिक्शन, कॉरपल टनल सिंड्रोम, कंप्यूटर विजन सिंड्रोम, डिप्रेशन आदि अनेक परेशानियों से कंप्यूटर उपयोक्ता का सामना होना तय है। विभिन्न आयु वर्ग के बच्चे कंप्यूटर के आगे मॉनीटर की स्क्रीन पर आंखें गड़ाए अपनी पसंद के गेम खेलते रहते हैं, कार्टून या एनीमेशन फिल्में देखते रहते हैं या फिर अन्य कार्य करते रहते हैं। उनका बचपन आज कंप्यूटर के हवाले हो गया है। घर हो या स्कूल, बच्चों को बाह्य और आंतरिक रूप से कंप्यूटर ने बच्चों के व्यतित्व और दिनचर्या को बदलकर रख दिया है। जिन बच्चों को माता-पिता की व्यस्तता के कारण अधिकांश समय अकेले गुजारना पड़ता है उनके लिए कंप्यूटर ही एक अच्छा साथी सिद्ध होता है। यदि इंटरनेट कनेक्शन उपलब्ध हो तो सोने पर सुहागा।

कंप्यूटर गेम के लिए जॉय स्टिक या माउस का ही जमकर प्रयोग किया जाता है। रुचि का कार्य होने के कारण बिना हिलेडुले बच्चे निरंतर अपने काम में जुटे रहते हैं। लगातार माउस या जॉय स्टिक से एक ही क्रिया दुहराते रहने से उंगलियां थक जाती हैं। कंप्यूटर पर लगातार घंटों मॉनीटर पर नजरें गड़ाए उंगलियों से की बोर्ड पर काम करते रहने से उंगलियों की संवेदनशीलता में कमी आने लगती है जिससे मांसपेशियां कमजोर हाने लगती हैं। एक ही अवस्था में काफी देर तक बैठे रहने से पीठ दर्द की शिकायत होने तगती है। इसके साथ-साथ कंप्यूटर उपयोक्ता बांह मेज पर टिकी रहने से रक्त संचार और रीढ़ की हड्डी भी प्रभावित होते हैं। प्रायः कंप्यूटर उपयोग करने के लिए कुर्सी वयस्कों के अनुरूप बनी होती है, उसी बड़ी कुर्सी पर बैटकर बच्चे कार्य करते हैं। इस प्रकार बच्चों के पैर जमीन से ऊपर ही लटकी हुई अवस्था में रहते हैं। परिणामस्वरूप उनके पैरों में दर्द भी रहने लगता है।

कंप्यूटर पर काम करते रहने का सर्वाधिक असर आंखों पर पड़ता है। मेज की चौड़ाई का एक बड़ा भाग एक सामान्य मॉनीटर घेर लेता है जिससे मॉनीटर और उपयोक्ता की आंखों के बीच की दूरी काफी कम रहती है। प्रायः यह दूरी लगभग 40-50 सेमी। ही होती है। हां, एलसीडी मॉनीटर के उपयोग से यह दूरी बढ़ाई जा सकती है। एलसीडी मॉनीटर कुछ महंगा अवश्य है पर काफ़ी सुविधाजनक सिद्ध होता है। कंप्यूटर स्क्रीन पर लगातार नजरें गड़ाए रहने से आंखों पर खिंचाव पड़ने लगता है। उपयोक्ता बच्चा हो बड़ा, इससे उसकी आंखें अवश्य प्रभावित होती हैं। आंखों में जलन, निकट व दूर की चीजें देखने में असुविधा होना, थकान आदि परेशानियां सामने आती हैं। इससे गर्दन, कमर, पीठ, कलाई व बाजुओं में दर्द होना या बने रहना आदि व्याधियां सामने आती हैं।

कंप्यूटर पर प्रतिदिन 2-3 घंटे काम करते रहने पर प्रायः खास परेशानी नहीं होती। इससे अधिक समय लगातार काम करना परेशानी पैदा करता है। कम्यूटर हमारा अच्छा सहयोगी सिद्ध हुआ है पर अति हर बात की बुरी होती है। यानी इस पर जमकर काम करते रहना परेशानियों को न्यौता देता है। जानेमाने मनोचिकित्सक डॉ. संजीव सक्सेना के अनुसार जो लोग कंप्यूटर पर नियमित रूप से काफी समय निरंतर काम करते रहते हैं वे अकेलेपन के शिकार हो जाते हैं। वे अपने जीवन के वास्तविक आनंद से वंचित होने लगते हैं। कंप्यूटर पर लगातार काम करने की धुन, लगन, आदत, आवश्यकता, मजबूरी या आनंद का अनुभव करना और कंप्यूटर पर किसी दिन काम न कर पाना या अपेक्षाकृत कम समय काम कर पाना एक अलग प्रकार की परेशानी का अनुभव कराता है। इससे झुंझलाहट होना, दिनचर्या में अधूरापन अनुभव होना आदि से सामना होन के अलावा उपयोक्ता के सामान्य व्यवहार में भी बदलाव आ जाता है। ऐसी स्थिति व्यक्ति के लती या एडिक्ट होने की द्योतक है। कंप्यूटर एडिक्ट जब कंप्यूटर पर काम नहीं कर पाता तो वह परेशान होने लगता है। ज्यौं ही वह कंप्यूटर का उपयोग करने का अवसर मिलता है, स्वयं को किसी शहंशाह से कम नहीं समझता और कंप्यूटर छोड़कर जाने का उसका मन नहीं करता। इसके लिए उपयोक्ता अपने परिजनों, मित्रों, नियोक्ता आदि से झूठ बोलने से भी पीछे नहीं हटता।
टी.सी. चन्दर
सौजन्य: प्रभासाक्षी
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Wednesday, June 17, 2009

कार्टूनिस्ट

प्रतिभावान कार्टूनिस्टों का भविष्य सुनहरा है
कार्टूनिस्ट काक कहिन


कार्टूनिस्ट काक से कार्टूनिस्ट टी.सी. चन्दर की बातचीत

एक कार्टूनिस्ट होने के नाते कार्टून को आप कितना महत्वपूर्ण मानते है?
अगर आप अपनी चौबीस घंटों की दिनचर्या की वीडियो रिकॉर्डिंग करके रख दें। उसे कुछ समय बीतने के बाद आप देखें तो निश्चय ही आपको यह लगेगा कि आप हर क्षण को एक कार्टून की तरह ही जिए। आपकी हर भाव-भंगिमा, अभिव्यक्ति, विभिन्न क्रियाकलाप आदि निरर्थक ही नहीं थे अपितु उनमें से अधिकांश हास्यास्पद ही थे। आपकी गम्भीरता, प्रसन्नता, रुदन, क्रोध, खीझ, उदासी, आध्यात्मिकता, औरों के साथ आपका व्यवहार, आदि एक-एक कर आपके सामने आयेंगे और आपके व्यक्तित्व का मखौल उड़ाते दिखेंगे। जब सारी दिनचर्या ही कार्टूनी गतिविधियों से भरी हो तो कार्टून का अलग से महत्व खोजना बेमानी है। महत्व तो आयी-गयी चीज का होता है। अगर कार्टून बनाकर जीवन के क्रियाकलापों को कागज पर उतार सकें तो यह कार्य जीवन की जीवन्तता का प्रतीक बन जाता है। जीवन को देखने-संवारने का जितना काम कार्टून कला के माध्यम से हो सकता है उतना किसी और माध्यम से हो ही नहीं सकता।

कार्टून बनाने की प्रेरणा कैसे मिली?
बड़ा परिवार, पिता की बैठक में विभिन्न प्रकार के लोगों का आना-जाना, रिश्तों की विविधता और विस्तार, हर छोटे-बड़े के बीच परस्पर चलने वाले हास्य-व्यंग्य के प्रसंगों में कार्टून का बोध होता रहता था। अगर मामा के यहां गये तो पूरी बस्ती के बीच मामा-भांजे का रिश्ता कायम हो जाता था। भाई की ससुराल, अपनी ससुराल होती थी। साली-साले, सलहज, देवर, ननद, भाभी-इन सबके बीच मर्यादा को बरकरार रखते हुए कुछ भी कह लेने की छूट होती थी। मामा-मामी, बुआ-फूफा, चाचा-चाची आदि भी अपरोक्ष रूप से कटाक्ष करते ही थे, पूरे गांव-समाज का व्यवहार भी अपनत्व भरा खुलापन लिए होता था। लिहाजा कला की कॉपी में कार्टूनी आकृतियां बनाकर स्कूल में गुरूजी का ‘गुड’ पा लेने से कहीं कार्टून बनाने की शुरूआत हो गयी। पहला कार्टून एक अल्पजीवी दैनिक में छपा लेकिन वास्तव में शुभारम्भ कानपुर से प्रकाशित होने वाले लोकप्रिय अखबार दैनिक जागरण से हुआ।

अब कार्टूनिंग की क्या स्थिति है?
दरअसल सन् 1983 में जब मैं जनसत्ता में पहुंचा तो उस समय कार्टूनिंग बुझ-सी रही थी। आर.के. लक्ष्मण के कार्टूनों में भी वह बात नहीं आ पा रही थी। सुधीर दर कभी छपते थे, कभी नहीं। यहां तक कि कार्टून पहले पन्ने की जगह अन्दर के पन्नों पर छपने लगे थे। राजेन्द्र पुरी के कार्टूनों को हर अखबार छापने की जुर्रत नहीं करता था। अबू अब्राहम भी दिक्कत महसूस कर रहे थे। ’शंकर्स’ वीकली’ पहले ही बन्द हो चुकी थी। लिहाजा जब मैंने जनसत्ता में कार्टून बनाना शुरू किया तो हिन्दी-अंग्रेजी पत्रकारिता में अनुभव किया जाने लगा कि कार्टून के माध्यम से बहुत कुछ कहा जा सकता है और वह भी बिना कोई खतरा मोल लिए। जब कि सम्पादकीय, लेखों या रिपोर्टों के माध्यम से उतना नहीं कहा जा सकता। जनसत्ता के कार्टूनों का जिक्र होता तो हिन्दी के अखबार और कार्टूनों का वर्चस्व उजागर होता। तब अंग्रेजी अखबारों में कार्टूनों की फिर से तलाश शुरू हुई और हिन्दी अखबारों में शुरूआत। लगभग हर छोटे-बड़े हिन्दी अखबार में कार्टून को स्थान मिलने लगा। अनेक नये कार्टूनिस्ट सामने आये। पर संयोग, मेरे छपे कार्टूनों का तीखापन मेरी पहचान बनता गया। मेरे रिटायर होने के बाद ‘कार्टून’ के झंझट से मुक्ति पाने के लिए फिर अखबार सक्रिय हो गये। आज कैरीकेचर और कार्टूनी रेखांकन बनाने वालों की एक अच्छी पौध पनपी है पर देशकाल को कार्टून के माध्यम से प्रभावित करने वाली परम्परा फिर लुप्तप्राय होती जा रही है या यूं कहें कि दबा दी गयी है। कार्टून अन्दर के पन्नों पर पहुंचा दिया गया है। यह स्थिति अच्छी नहीं है। समाचार पत्र-पत्रिकाओं के मालिकों और सम्पादकों को कार्टून की लोकप्रियता और प्रभावशाली भूमिका को स्वीकार करते हुए उसे पर्याप्त महत्व देना ही चाहिए। मुझे आशा है कि स्थिति फिर बदलेगी।

कार्टूनों की सार्थकता को लेकर आप क्या कहेंगे?

राजनीतिक कार्टून ही सबकुछ नहीं हैं-वैसे जब तक बेबाक और सार्थक कार्टून जो राजनीतिक गतिविधियों को सही परिप्रेक्ष्य में लाने में सक्षम न हों तब तक राजनीतिक कार्टूनों की को प्रासंगिकता भी नहीं है। जीवन को पूर्णता के साथ कार्टून के माध्यम से देखा जा सकता है, इसके अलावा और रास्ते भी खुलते हैं। प्रचार-प्रसार, प्रेरक संदेश, शुष्क पाठ्य सामग्री में एकरसता तोड़ने और समझने में सहायक कार्टून, कार्यालयों, अस्पतालों, रेलवे स्टेशनों, बैकों, सेना, सार्वजनिक स्थानों में ही नहीं जहां नजर जाती है वहां कार्टून अपनी प्रभावशाली भूमिका निभा सकते हैं। बस सवाल उनके उपयोग के लिए मन बनाने का है। कार्टून समाज की प्रगति और जीवन्तता को दर्शाते हैं। अच्छे कार्टून उस भाषा और समाज को दर्पण दिखाने का काम करते हैं और उसकी प्रगति भी बताते हैं।

नये कार्टूनिस्टों के लिए आमदनी की दृष्टि से यह क्षेत्र कैसा है?
मौजूदा हालात में अखबार ही कार्टूनों के प्रस्तुतीकरण का एकमात्र सही माध्यम हैं और माध्यम भी अब अपना रूप बदल चुका है यानी कार्टून के लिए नकारात्मक भूमिका तैयार है। इससे कार्टूनिस्ट की भूमिका भी गौण हो चुकी है। इस तरह बहुत ज्यादा आमदनी का दौर अभी भी शुरू नहीं हुआ है पर कार्टूनों की उपयोगिता का दायरा अवश्य बढ़ा है, अनेक पत्र-पत्रिकाएं अब भी महत्व के साथ कार्टून छाप रही हैं। खास तौर पर विजुअल मीडिया में नये दरवाजे खुले हैं। कम्प्यूटर का उपयोग बढ़ा है। नयी तकनीक ने नयी राहें खोली हैं। एनीमेशन का विशाल संसार हमारे सामने है। कम्प्यूटर और एनीमेशन की इस नयी तकनीक को जानने-समझने-अपनाने के प्रति नयी पीढ़ी आकर्षित हुई है। हमारे देश में एनीमेशन का कार्य निरन्तर विस्तार पा रहा है। अगर जीवन को गहराई जानने वाले और नयी तकनीक में पारंगत नये कार्टूनिस्टों की पौध लगायी जाए तो विदेशी मुद्रा का अकूत भंडार भारत की झोली में आ सकता है। हालांकि इस ओर काफी प्रयास चल भी रहे हैं। प्रतिभावान कार्टूनिस्टों के लिए सुनहरा भविष्य इंतजार कर रहा है। एक अच्छे कार्टूनिस्ट के लिए जन्मजात प्रतिभा और रुचि अधिक उपयोगी सिद्ध होती है। पर किसी में कला और कार्टून कला के प्रति थोड़ी रुचि हो तो भी उसे सही प्रशिक्षण और अभ्यास से निपुण बनाया जा सकता है। नये कार्टूनिस्ट जीवन को निकट से बारीकी से देखें, समझें और यह देखें कि कार्टून के माध्यम से क्या कुछ नया जोड़ सकते हैं, उसके प्रति ईमानदारी से प्रयास करें गुदगुदाने के साथ-साथ व्यक्तित्व में निखार लाने को प्रेरित करने वाले कार्टूनों की हर कदम पर सदा जरूरत बनी रहती है।

कार्टूनिस्ट होते तो?
कार्टूनिस्ट न होते तो अच्छी-खासी सरकारी नौकरी करते हुए रिटायर होते। पर नहीं, मेरे लिए यह कैरियर का सवाल नहीं था, बल्कि कैरियर के रूप में कार्टूनिंग को अपनाना एक पागलपन-सा लगता था। मैं कार्टूनिंग को पूरी तरह अंगीकार करने के मामले में बीस साल इंतजार करता रहा। दरअसल मेरा जीवन कहीं विकराल विडम्बनाओं से घिर गया था और लग रहा था जैसे मेरे लिए जीवन का कोई अर्थ ही न हो। जब दैनिक जागरण के संपादक स्वर्गीय नरेन्द्र मोहन ने 6 जुलाई 1967 को मेरा बनाया पहला कार्टून छापा तो अनायास ही मैं अपना जीवन नहीं, कार्टूनिंग जीने लगा। बकौल लखनऊ के तेजतर्रार पत्रकार विनोद शुक्ल के, अगर जीवन में सब कुछ ठीक-ठाक होता तो आप काक न होते।
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कार्टूनिस्ट चन्दर

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Saturday, May 23, 2009

बनें कार्टूनिस्ट

छुट्टियों में बन जाएं      कार्टूनिस्ट

सामान्यतः कार्टून दो प्रकार के होते हैं-मूक और सवाक या सम्वाद सहित। मूक कार्टून में किसी घटना या प्रसंग की रोचक प्रस्तुति देखने वाले को हंसा देती है। ऐसा सवाक कार्टून अच्छा माना जाता है जिसमें संवाद और चित्र एक-दूसरे के पूरक हों।
कार्टून बनाना आनन्द देने वाली कला है, जिसे सीखना बहुत आसान है। नियमित अभ्यास और मार्गदर्शन से आप स्वयं इस कला में पारंगत हो सकते हैं। तरह-तरह के चेहरे और नैन-नक्श बनाने का अभ्यास करें। अधिकांश बड़े कार्टूनिस्ट इसी प्रकार सफल हुए हैं।

सामग्री- साधारण सफेद कागज या न्यूजप्रिण्ट पेपर की स्कैच बुक, बी या 2बी नम्बर की मुलायम काली पेंसिल या क्लिक पेंसिल, अच्छी रबड़ और साफ मुलायम कपड़े का टुकड़ा लें। अब हलके हाथ से सबसे पहले आड़ी, खड़ी और विभिन्न कोणों पर मुड़ी, तिरछी और सीधी रेखाएं खींचने का खूब अभ्यास करें। फिर गोलाकार या वक्र रेखाएं खींचें। पेंसिल से किये गये इस अभ्यास को बाद काली वाटर प्रूफ स्याही, निब-होल्डर, ब्रश (1, 2 व 3 नम्बर), ड्रॉइंग पेन, बो पेन, क्रोक्विल, रैपिडोग्राफ (.3, .4 या .5 नम्बर), आदि में से 1-2 या सभी से यही अभ्यास करें पेंसिल, होल्डर या पेन कभी कसकर न पकड़ें और न ही कागज पर अधिक दवाब डालकर या गड़ाकर चलाएं।

चेहरे बनाएं- आमतौर पर सबके चेहरों की बनावट एक-दूसरे से भिन्न होती है। आरम्भ में गोल, अण्डाकार आदि चेहरे बनाने का अभ्यास करें। आंख, कान, मुंह आदि बनाएं। चेहरों को साइड पोज और विभिन्न कोणों से भी बनाएं। इसके लिए हलके हाथ से निर्देश रेखाएं भी खींचें। इन चेहरों पर मुस्कान, दुःख, हंसी, गुस्सा, खिसियाहट, आश्चर्य, शरारत, डर आदि भाव लाएं। ये भाव 1-2 रेखाओं के द्वारा आसानी से दिखाए जा सकते हैं। मूंछ, दाढ़ी, बाल, तिलक, चश्मा, तिल, मस्सा, पगड़ी आदि पहचान या प्रतीक चिह्न भी बनाएं।

अपने आसपास के लोगों, वस्तुओं, दृश्यों आदि को ध्यान से देखने की आदत डालें। इनको देखकर और बाद में स्मृति के आधार पर बनाने का अभ्यास करें। कार्टून बनाने के साथ-साथ वास्तविक चित्रण का अभ्यास (स्कैचिंग) भी करते रहें। ये कार्य कार्टून बनाने में उपयोगी सिद्ध होंगे।
निर्देश रेखाएं- चेहरा, पूरी आकृतियां और सभी वस्तुओं, उनकी गतिशीलता के चित्रण में निर्देश रेखाएं महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। ये रेखाएं बहुत हलके हाथ से खींचनी चाहिए ऐसा करने से कार्टून को अन्तिम रूप देने के बाद इन्हें रबड़ से मिटाने में आसानी होगी। निर्देश रेखाओं के उपयोग से आप अपने पात्रों की सही वेशभूषा और अन्य वस्तुएं भी अच्छी तरह बना सकते हैं। कार्टून में एक से अधिक पात्र साथ-साथ बनाने पर उनके सही आकार व बनावट का ध्यान रखना चाहिए। ऐसा न हो कि बच्चा पिता से बड़ा बने या हाथी से बड़ा कुत्ता दिखे।

सामान्यतः कार्टून दो प्रकार के होते हैं-मूक और सवाक या सम्वाद सहित। मूक कार्टून में किसी घटना या प्रसंग की रोचक प्रस्तुति देखने वाले को हंसा देती है। ऐसा सवाक कार्टून अच्छा माना जाता है जिसमें संवाद और चित्र एक-दूसरे के पूरक हों। कार्टून के लिए सही आकार का बॉक्स या आयत बनाकर उसके ऊपरी भाग में सम्वाद की जगह छोड़, उसमें रेखाएं खींचकर पेंसिल से सम्वाद लिख दें। फिर निर्देश रेखाओं के उपयोग से पात्र, उनके उचित हावभाव, पहनावा, दृश्य आदि बनाएं। फिर काली स्याही, पेन, होल्डर, ब्रश, या रेपिडोग्राफ का उपयोग कर कार्टून को अन्तिम रूप दें। स्याही सूखने पर पेन्सिल की रेखाओं को हलके हाथ से रबड़ से मिटा दें। कार्टून में काली स्याही से बनी अनावश्यक रेखाओं को मिटाने या ठीक करने के लिए सफेद या सुपर व्हाइट पोस्टर
कलर और ब्रश का उपयोग करें।

कार्टून का आकार- छपे हुए कार्टून मूल रूप से 2, 4 गुना या अधिक बड़े बनाये जरते हैं। इससे कार्टून साफ और अच्छे दिखते हैं तथा कार्टूनिस्ट को काम करने में सरलता होती है। इसी प्रकार आप कार्टून, कार्टून स्ट्रिप, कॉमिक आदि के लिए सही आकार का आयत या वर्ग बना सकते हैं। इसके चारों ओर 1.5 से.मी. खाली छोड़कर बाकी स्थान स्टील के स्केल और कटर या ब्लेड से काटकर अलग कर दें।

कार्टून स्ट्रिप और कॉमिक- आमतौर पर कार्टून स्ट्रिप में 2, 3 या 4 बॉक्स होते हैं और कॉमिक के एक पृष्ठ में 4, 6, 8 या 10 बॉक्स या दृश्य होते हैं। कॉमिक और कार्टून स्ट्रिप में कहानी व सम्वाद के अनुसार समानता लिए हुए पात्र, दृश्य आदि अलग-अलग कोणों से से क्रमवार ढंग से बनाए जाते हैं।

रंगीन कार्टून- कार्टून को अंतिम रूप देने के बाद मूल प्रति या उसकी फोटो
प्रति में सही रंग भरे जाते हैं। छपने पर अच्छे परिणाम के लिए फोटो कलर भरे जाते हैं। वाटर कलर, पेस्टल कलर, पोस्टर कलर आदि का उपयोग भी किया जाता है। कार्टून स्कैन कर उनमें कम्प्यूटर से भी रंग भरे जाते हैं। इसके लिए कम्प्यूटर के उपयोग का प्रशिक्षण ले लेना चाहिए।
अब देर किस बात की, कीजिए शुरूआत!
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कार्टूनपन्ना, कार्टूनकाल, मुस्कानदूत



छुट्टियों में बन जाएँ कार्टूनिस्ट
बाल पत्रिका नंदन में प्रकाशित


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Thursday, May 7, 2009

रोज़गार

कार्टूनिस्ट बनकर कमाइए धन और यश

अनेक लोगों के मस्तिष्क में कार्टून बनाने लायक विचार प्रायः आते रहते हैं। चूंकि वे कार्टून बनाना नहीं जानते सो रोजाना अनगिनत कार्टूनी विचारों की मृत्यु होती रहती है। आपकी रुचि कार्टून बनाने में और आप रेखांकन करते रहते हैं या करना चाहते हैं तो आपकी राह मुश्किल नहीं है। आप कार्टून कला में निपुण होकर इसे शौक, पार्ट टाइम या फुल टाइम व्यवसाय यानी करियर के रूप में अपना सकते हैं।

कला ही जीवन है-यह निश्चय ही आपने पढ़ा-सुना होगा। भूगोल, इतिहास, रसायन विज्ञान, गणित या किसी अन्य विषय के बारे में ऐसा नहीं कहा जाता। कला की महत्ता को काफी समय पहले ही पहचान कर इसके बारे में कहा गया है। व्यंग्यचित्र यानी कार्टून कला भी कला की एक महत्वपूर्ण विधा है। कार्टून कला के उपयोग के क्षेत्र को आज जैसा विस्तार मिला है वैसा पहले कभी नहीं मिला। लगभग हर उम्र के लोगों में कार्टून बेहद लाकप्रिय है। समाचार पत्र, पत्रिकाओं, चित्रकथाओं के अलावा टीवी, इण्टरनेट, एनीमेशन, प्रचार सामग्री, पैकेजिंग, पहचान चिन्ह आदि तमाम क्षेत्रों में कार्टून कला का ही बोलबाला है। विभिन्न कार्टून पात्र जनमानस में अपनी अच्छी पैठ बना चुके है।

अनेक लोगों के मस्तिष्क में कार्टून बनाने लायक विचार प्रायः आते रहते हैं। चूंकि वे कार्टून बनाना नहीं जानते सो रोजाना अनगिनत कार्टूनी विचारों की मृत्यु होती रहती है। आपकी रुचि कार्टून बनाने में और आप रेखांकन करते रहते हैं या करना चाहते हैं तो आपकी राह मुश्किल नहीं है। आप कार्टून कला में निपुण होकर इसे शौक, पार्ट टाइम या फुल टाइम व्यवसाय यानी करियर के रूप में अपना सकते हैं। अनेक कार्टूनिस्ट ऐसे है जो अच्छे पदों पर कार्य या व्यवसाय करते हुए कार्टून कला को अपनाए हुए हैं। अनेक लोग कार्टूनिस्ट के रूप में फुल टाइम या पार्ट टाइम नौकरी कर रहे हैं।

अधिकांश जानेमाने कार्टूनिस्ट बिना किसी विशेष प्रशिक्षण के निपुण हुए हैं। वैसे भी हमारे यहां कार्टून कला सिखाए जाने का समुचित और विशेष प्रबन्ध नहीं है। यही नहीं, हिन्दी में अच्छी पुस्तकों का भी अभाव है। कार्टून केद्रित पत्रिकाएं भी बहुत कम या कहें के बराबर हैं।

अच्छा कार्टूनिस्ट बनने के लिए वास्तविक चित्रण का ज्ञान होना और निरन्तर अभ्यास करना उपयोगी सिद्ध होता है। इसके लिए लिए किसी योग्य प्रशिक्षक या कला ज्ञाता से प्रशिक्षण लिया जा सकता है। किसी विद्यालय या कला विद्यालय में प्रवेश लेकर कला की विधिवत शिक्षा ली जा सकती है। कला विद्यालयों में प्रायः पेण्टिंग, शिल्प (स्कल्पचर) और अनुप्रयुक्त कला (एप्लाइड आर्ट) 4 वर्षीय पाठ्यक्रम होता है। हर हाल में नियमित अभ्यास आपको ही करना होगा। चित्रकला और शरीर रचना (एनोटॉमी) सम्बन्धी अच्छी पुस्तकों को देखना-पढ़ना और अभ्यास करना चाहिए। अपने अवलोकन, फोटो, चित्र आदि की सहायता से रेखांकन करना चाहिए। सादा सफेद कागज पर 2बी या 4बी नम्बर की मुलायम काली पेंसिल हलके हाथ चलाते हुए निर्देशानुसार खूब अभ्यास करना चाहिए। बाद में छपे हुए कार्टूनों को देखकर पेंसिल से बनाएं और काली स्याही होल्डर, पेन, क्रोक्विल, बो पेन, ब्रश, या कलम आदि में से चुनें और उससे कार्टून बनाएं। छपने के लिए कार्टून भेजने से पहले कुछ विशेष बातों का ध्यान रखा जाता है ताकि आपके सभी कार्टून खेद सहित वापस लौटें।

किसी कार्टून का आधार उसका विचार होता है। कार्टून एक या अधिक सम्वाद या किसी प्रसंग या घटना पर आधारित बिना सम्वाद वाला हो सकता है। हर कार्टूनी विचार को पॉकेट डायरी में तारीख के साथ लिखकर रख लें। अपने पास सदा एक पॉकेट डायरी और पेन या पेंसिल अवश्य रखें।याद रखिए, एक बार गया विचार फिर लौटकर नहीं आएगा। आवश्यकता और मांग के अनुरूप भी विषय या सामग्री आधारित कार्टून या कार्टून चित्र (इलस्ट्रेशन) बनाए जाते हैं।

कुछ लोग कार्टून को आड़ी-तिरछी रेखाओं की प्रस्तुति मानते हैं पर वास्तव में ऐसा नहीं है। एक अच्छे कार्टून में किसी अच्छे चित्र की भांति ही कला के नियमों का ध्यान रख जाता है। कार्टन में वस्तु, पात्र, दृश्य या पृष्ठभूमि या वातावरण आदि का वास्तकि चित्रण की भांति ध्यान रख जाता है। इसके अलावा पात्र या वस्तुओं के वास्तविक जैसे काल्पनिक रूप, दृश्य या वातावरण, सही अनुपात, परिप्रेक्ष्य, आकार, संवाद, हावभाव, संतुलन आदि का पर्याप्त ध्यान रख जाता है। इसी प्रकार कार्टून में रंग भरते समय भी अनेक बातों का ध्यान रखा जाता है। इस प्रकार एक अच्छे विचार की कार्टून के रूप में सही प्रस्तुति की जा सकती है।

कार्टून कला में कम्प्यूटर का उपयोग भी खूब हो रहा है। एक कार्टूनिस्ट के लिए कम्प्यूटर और फ़ोटोशॉप, कोरल ड्रॉ, इलस्ट्रेटर आदि सम्बन्धित सॉफ्टवेयरों की जानकारी एक अतिरिक्त योग्यता होती है। हाथ से बनाए कार्टून को सकैन कर या कम्प्यूटर पर ही कार्टून बनाकर उसमें उचित रंग भरना और विशेष प्रभाव दर्शाना भी एक कला है। सभी कार्टून डाक द्वारा या कम्प्यूटर और इण्टरनेट का उपयोग करते हुए -मेल द्वारा भेजे जा सकते हैं। -मेल सेवा त्वरित और मुफ्त उपलब्ध है।

पत्र-पत्रिकाओं के अलावा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एक कार्टूनिस्ट को निर्धारित वेतनमान के अनेसार या मोलभाव के बाद अच्छा वेतन मिलता है। अनुबन्ध पर भी कार्टूनिस्ट रखे जाते हैं और पार्टटाइम भी। स्वतन्त्र रूप से कार्टून बनाने पर निर्धारित दर या तय राशि के अनुसार भुगतान किया जाता है। प्रायः कार्टून छपने के 1 से 3 माह के भीतर या कहीं-कहीं स्वीकृंति के साथ ही क्रॉस्ड चैक द्वारा भुगतान किया जाता है। भगतान का तरीका प्रकाशन या प्रतिष्ठान के नियमों के अनुसार ही होता है। अपने कार्य की फोटो कॉपी तारीख सहित अपने पास अवश्य रखनी चाहिए।

दैनिक समाचार पत्र के सम्पादकीय कार्टूनिस्ट के लिए कल्पनाशीलता, किसी सामयिक या समसामयिक घटना या प्रसंग पर त्वरित व्यंग्यात्मक टिप्पणी रेखाओं और आवश्यकतानुसार रंगों के उपयोग द्वारा व्यक्त करना, राजनीति और राजनीतिज्ञों के बारे में पर्याप्त जानकारी रखना, खबरों से नियमित रूप से जुड़े रहना, खूब पढ़ना आदि बातों का होना आवश्यक है।

वर्गीकरण के अनुसार कार्टूनों के प्रमुख प्रकार-


सम्पादकीय कार्टून- समाचार पत्रों के मुख पृष्ठ पर छपने वाले सामयिक-समसामयिक विषयों पर छपने वाले पाकेट कार्टून और 3, 4 या अधिक कॉलमों में छपने वाले बड़े कार्टून राजनीतिक या सम्पादकीय कार्टून कहलाते हैं।

सामान्य कार्टून और कार्टून स्ट्रिप- समाचार पत्र और विभिन्न पत्रिकाओं में छपने वाले गैर राजनीतिक यानी घरेलू, सामाजिक, व्यावसायिक आदि प्रकार के कार्टून और कार्टून स्ट्रिप सामान्य कार्टून और कार्टून स्ट्रिप होते हैं। ये 1, 2, 3 या अधिक फ्रेम वाले कार्टून होते हैं। इनमें सम्वाद और चित्रों या केवल चित्रों के माध्यम से कार्टूनिस्ट अपनी बात कहता है। एक से अधिक फ्रेम वाले कार्टूनों में पात्रों और वस्तुओं को अलग-अलग कोणें आकार में प्रस्तुत करने में उनकी एकरूपता का ध्यान रखा जाता है।

कॉमिक या चित्रकथा- प्रायः 28 या अधिक पृष्ठों में छपने वाली चित्रकथा में पूरी कहानी चित्र और सम्वादों के द्वारा प्रस्तुत की जाती है। प्रायः चित्रकथा की कहानी और पटकथा लेखक अलग-अलग व्यक्ति होते हैं। यदि कार्टूनिस्ट सक्षम है तो ये काम भी वह स्वयं कर लेता है। कॉमिक प्रायः रंगीन होते हैं। मूल चित्र छपे चित्रों की अपेक्षा कम से कम दो गुने बड़े आकार में बनाए जाते हैं।

इलस्ट्रेशन- किसी लेख कहानी या अन्य सामग्री को सचित्र और प्रभावशाली बनाने के लिए कार्टूनिस्ट से उपयुक्त चित्र बनवाया जाता है।

कैरीकेचर- यह व्यक्तिचित्र होता है जिसमें अक्सर उस व्यक्ति के गुण, कार्य या व्यवसाय, शौक आदि को भी व्यंग्यात्मक रूप में शामिल किया जाता है। कैरीकेचर बनाने के लिए सम्बन्धित व्यक्ति के एकाधिक फोटो की सहायता लेकर इस प्रकार उसका व्यंग्यचित्र बनाया जाता है कि वह व्यक्ति आसानी से पहचाना जा सकता है।

कल्पनाशक्ति का उपयोग करते हुए उस व्यक्ति के चेहरे की बनावट को इस प्रकार तोड़मरोड़कर बदला जाता है कि वह वास्तविक चित्र नहीं रहता पर उसकी पहचान कायम रहती है। प्रायः राजनेताओं, बड़े वयवसाइयों और प्रद्धि व्यक्तियों के कैरीकेचर बनवाकर छापे जाते हैं।

एनीमेशन फिल्म- अधिकांश बच्चे ही नहीं बड़े भी एनीमेषन और कार्टून फिल्मों के दीवाने होते हैं। अनेक कार्टून पात्र उनके मन-मस्तिष्क पर राज करते हैं। 24 घण्टे चलने वाले अनेक कार्टून टीवी चैनल इसका प्रमाण हैं। विज्ञापन फिल्मों में भी कार्टून पात्रों का खूब उपयोग हो रहा है। एक कार्टून फिल्म बनाने में अनेक लोगों की
भूमिका होती है। इसके लिए काफी सूझबूझ, निपुणता और पश्रिम की आवश्यकता होती है। श्रम सस्ता होने के कारण हमारे यहां एनीमेशन का काम इतना बढ़ गया है कि आज के समय को एनीमेशन युग कहें तो गलत नहीं होगा। अनेक जानेमाने भारतीय फिल्म कलाकार एनमेशन फिल्में बनाने में जुट गये हैं। जगह-जगह एनीमेशन इंस्टीट्यूट खुल गये हैं।

वेबसाइट- विभिन्न वेबसाइटें और समाचार पोर्टल भी यिमित रूप से कार्टून छापते हैं या अन्य प्रकार से कार्टूनों का उपयोग करते हैं। एक कार्टूनिस्ट अपनी खुद की वेबसाइट बनाकर अपने कार्य के नमूने, पारिश्रमिक की दरें और अपना पूरा परिचय दशाकर देश-विदेश के लिए कार्य करके ना और दाम दोनों कमा सकता है। अपनी वेबसाइट को दैनिक, साप्ताहिक या अन्य प्रकार से अपडेट करते हुए असंख्य लोगों को अपने बारे में बताया जा सकता है। इसके बारे में किसी जानकार व्यक्ति से पहले पूरी जानकारी लेना ठीक रहता है।

सिण्डीकेटेड कार्टून सेवा- अपने बनाए कार्टूनों को देश-विदेश के अनेक पत्र-पत्रिकाओं को भेजने के लिए एजेंसी आरम्भ की जा सकती है। इसके माध्यम से अन्य कार्टूनिस्टों के कार्टन भी कमीशन के आधर पर भेजे जा सकते हैं। एक सिण्डीकेटेड कार्टून कई पत्र-पत्रिकाओं को बहुत कम दर पर भेजा जाता है। अतः छोटे-बड़े, हिन्दी-अंग्रेजी, राष्ट्रीय-क्षेत्रीय7सभी प्रकार के पत्र-पत्रिकाएं ऐसे कार्टून मंगाकर छाप सकते हैं। प्रायः हमारे यहां विदेशी कार्टून और कार्टून स्ट्रिप खूब छपती हैं।

रोजगार के अवसर- पत्र-पत्रिका पुस्तक प्रकाशन गृह, विज्ञापन एजेंसियां, वेबसाइटें, एनीमेशन कम्पनियां, एनीमेशन इंस्टीट्यूट, टीवी चैनल, ग्रीटिंग कार्ड कलेण्डर निर्माता आदि समय-समय पर विज्ञापन देकर कार्टूनिस्टों को बुलाते हैं। कल्पनाशील, समय के पाबन्द, कुशल, अनुभवी, व्यवहारकुशल आदि गुणों को ध्यान में रखते हुए कार्टूनिस्ट का चयन कर नियुक्त किया जाता है। वेतन या पारिश्रमिक पूर्वनिधारित के अनुसार या विशेष परिस्थितियों में अधिक भी दिया जाता है। एक कार्टूनिस्ट के रूप में आरम्भ में कुछ हजार रुपये प्रति माह कमाये जा सकते हैं। निपुणता और अनुभव प्राप्त करने के साथ-साथ अच्छे अवसारों का ध्यान रख जाए और अपने सम्पर्कों का उपयोग किया जाए तो जल्दी ही अच्छा अवसर मिल सकता है।

कार्टून- पहले विचार के अनुसार 2बी या 4बी नम्बर की काली मुलायम पेंसिल का उपयोग करते हुए सादा सफेद कागज पर रेखांकन किया जाता है। फिर काली वाटरप्रूफ स्याही और ब्रश, होल्डर, क्रोक्विल, पेन, बो पेन, रेपिडोग्राफ, कलम आदि में से एकाधिक का उपयोग करते हुए पर कार्टून बनाए जाते है। रबड़ से पेंसिल की
रेखाएं मिटा दी जाती है। आवश्यकतानुसार उनमें उपयुक्त रंग भरे जाते हैं। मूल कार्टून डेढ़-दो गुना बड़ा बनाया जाता है ताकि छपने के बाद वह साफ और अच्छा लगे। कार्टून के एक कोने में कार्टूनिस्ट सुपाठ्य रूप से अपना नाम या हस्ताक्षर अंकित करता है।

कार्टून के चारों ओर कागज पर 1 से.मी. या आधा इंच खली स्थान छोड़ना चाहिए। कार्टून के पीछे भी साफ अक्षरों में अपना पूरा नाम, पता, फोन नम्बर, -मेल आदि अवश्य लिखना चाहिए। एक बार में चुनकर 4-5 अच्छे कार्टून भेजने चाहिए। भेजे गये कार्टूनों का विवरण एक कॉपी या रजिस्टर में सुरक्षित रखना चाहिए और उनकी 1-1 फोटो कॉपी भी। अस्वीकृति की स्थिति में कार्टूनों की वापसी के लिए पर्याप्त डाक टिकट-पता युक्त लिफाफा अपने पत्र के साथ संलग्न करना चाहिए। प्रायः 15-30 दिन में स्वीकृति/अस्वीकृति की सूचना मिल जाती है। यदि देर हो जाए तो पूरे संदर्भ के साथ एक स्मरण पत्र भेजना चाहिए। कार्टूनों की स्वीकृति के बाद छपने पर 1-3 माह में नियमानुसार क्रॉस्ड चैक द्वारा भुगतान किया जाता है। कार्टून छपने पर पा्रयः सम्बन्धित पत्र-पत्रिका की लेखकीय प्रति भेजी जाती है पर उसके डाक में खो जाने की समस्या को ध्यान में रखते हुए स्वयं एक प्रति खरीद लेनी चाहिए।

कम्प्यूटर का उपयोग- कम्प्यूटर का उपयोग करने के लिए उसका आवश्यक प्रशिक्षण ले लेना चाहिए। यह काफी सुविधाजनक और उपयोगी है। इण्टरनेट के प्रयोग से अनेक अन्य सुविधाओं का लाभ मिल जाता है। -मेल का उपयोग बेहद आसान, मुफ्त और त्वरित है। अधिकांश जगहों पर इस सुविधा का उपयोग किया जा रहा है।

चित्रकला के विधिवत प्रशिक्षण के लिए समाचार पत्रों में समय-समय पर अखबारों में विज्ञापन छपते हैं। कला प्रशिक्षण और 4 वर्षीय डिग्री कोर्स बीएफए (बैचलर ऑफ फाइन आर्ट्स) करने के लिए महाविद्यालय-
- ललित कला महाविद्यालय (कॉलेज ऑफ़ आर्ट्स), तिलक मार्ग, नयी दिल्ली-110001
- इंस्टीट्यूट ऑफ फाइन आर्ट्स एण्ड डिजाइन, चैन्नेई, तमिलनाडु
- सर जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट्स, दादा भाई नौरोजी रोड, मुम्बई, महाराष्ट्र
- फैकल्टी ऑफ फाइन आर्ट्स, एम.एस. यूनीर्विसटी, बड़ौदरा, महाराष्ट्र
- नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजाइन, पालदी, अहमदाबाद-380007, गुजरात

आपके आसपास स्थानीय या निकट के विद्यालय या कॉलेज में भी कला प्रशिक्षण की सुविधा उपलब्ध हो सकती है, इस बारे में जानकारी प्राप्त कर लें। चाहें तो कला की बारीकियां जानने के लिए किसी कला शिक्षक की सेवाएं ले सकते है। इसके अलावा किसी प्रोफ़ेशनल कार्टूनिस्ट से भी सम्पर्क कर आवश्यक जानकारी और मार्गदर्शन प्राप्त कर सकते हैं। भविष्य में भी उनके सम्पर्क में बने रहें।
कार्टूनपन्ना 

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कार्टून इंस्टीट्यूट झांकी

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