Thursday, October 29, 2009

कार्टून चोर टीवी चैनल सीएनईबी


हिन्दी टीवी चैनल सीएनईबी द्वारा कार्टूनों की चोरी


साधन सम्पन्न हिन्दी समाचार टीवी चैनल सीएनईबी ने अलग-अलग ब्लॉगों पर प्रदर्शित मेरे कार्टूनों में से ५ कार्टून उड़ा लिए और मनमाने ढंग से उनमें बड़ी बेशर्मी के साथ फ़ेरबदल भी कर डाला। उल्लेखनीय है कि इसके लिए हिन्दी समाचार टीवी चैनल सीएनईबी ने मुझे किसी प्रकार की जानकारी या सूचना देना भी ठीक नहीं समझा, उपयोग के लिए पूर्वानुमति लेना तो बहुत दूर की बात है। बाप का माल जो समझा! यहां दिए चित्र को देखने से सहज ही अनुमान हो जाता है कि मुफ़्त के माल से किस प्रकार सज्जा करने का आनन्द लिया गया है।
इन कार्टूनों के बारे मैं जब मुझे पता लगा तो मैंने हिन्दी समाचार टीवी चैनल सीएनईबी के मुखिया और जानेमाने पत्रकार श्री राहुलदेव से फ़ोन पर सम्पर्क कर अपनी बात कही और उन्हें इस बारे में उनके ई-मेल पर विवरण भी भेज दिया। कई बार स्मरण संदेश भेजने पर भी उनकी ओर से मुझे कोई प्रतिक्रिया प्राप्त नही हुई। शायद उन्होंने प्रतिक्रिया देना उचित नहीं समझा या शायद उन्हें इसकी आदत ही नही है।
हिन्दी समाचार टीवी चैनल सीएनईबी की इस हरकत ने एक रचनाकार यानी कार्टूनिस्ट चन्दर के अधिकारों और कॉपीराइट का जिस बेशर्मी से हनन किया है, वह शर्मनाक है।

चित्र: (बांये) कार्टूनिस्ट चन्दर और (दांये) वरिष्ट पत्रकार श्री राहुल देव
यहां ऊपर दिए चित्र को आप चाहें तो उस पर क्लिक करके बड़ा करके भी देख सकते हैं।

आवश्यक हो तो कार्टूनिस्ट चन्दर से सम्पर्क करें: tcchander@gmail.com    cartoonistchander@gmail.com  फ़ोन ०-९८९१०८४७०७ (9891084707)
अन्य ब्लॉग (देखने के लिए उस पर क्लिक करें): कार्टूनिस्ट चन्दर, कार्टून इंस्टीट्यूट, कार्टूनकाल, टूनकाल, कार्टूनपन्ना (सुलेखा.कॉम), मुस्कानदूत
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Wednesday, July 15, 2009

सावधान

कंप्यूटर के निरंतर उपयोग से भी बढ़ती है परेशानी

विभिन्न आयु वर्ग के बच्चे कंप्यूटर के आगे मॉनीटर की स्क्रीन पर आंखें गड़ाए अपनी पसंद के गेम खेलते रहते हैं, कार्टून या एनीमेश फिल्में देखते रहते हैं या फिर अन्य कार्य करते रहते हैं। उनका बचपन आज कंप्यूटर के हवाले हो गया है। घर हो या स्कूल, बच्चों को बाह्य और आंतरिक रूप से कंप्यूटर ने बच्चों के व्यतित्व और दिनचर्या को बदलकर रख दिया है।



सुविधाजनक, आसान, समय बचाऊ आधुनिक उपयोगी तकनीक जल्दी ही लोकप्रिय हो जाती है भले ही उसमें कुछ कमियां हों या कुछ लोग उसकी आलोचना करते हों। आज की भागमभाग वाले जीवन में कंप्यूटर ने अपना खास स्थान बना लिया है, इतना खास कि अब लगभग हर क्षेत्र में कंप्यूटर की सहायता के बिना कार्य संपन्न हो पाना असम्भव सा माना जा सकता है। जो लोग कभी कंप्यूटर के नाम से ही नाक-भौं सिकोड़ा करते थे उनमें से अधिकांश कंप्यूटर की कार्यप्रणाली जानने-सीखने के इच्छुक हैं। यही नहीं ऐसे तमाम लोग अब कंप्यूटर का उपयोग करने के अभ्यस्त भी हो गए हैं।

कम्यूटर का निरंतर घंटों या रातदिन उपयोग करने वालों की भी कमी नहीं है। दिनप्रतिदिन कंप्यूटर पर हमारी निजी और व्यावसायिक निर्भरता बढ़ती ही जा रही है। यह आवश्यकता हो या मजबूरी, निःसंदेह अंततः घाटे का सौदा ही सिद्ध होगा। आधुनिक तकनीक जहां विभिन्न रूपों में अपनी उपयोगिता सिद्ध करती है वहीं उसकी कुछ कमियां या बुराइयां भी सामने आती हैं। यह स्थिति तब अधिक घातक होती है जब बिना सावधानी बरते अधिकतम लाभ प्राप्त करने के लिए निरंतर एक धुन के अधीन कार्य किया जाता है। निजी या व्यावसायिक या कार्यालय आदि के विभिन्न कार्यों के लिए कंप्यूटर का आज जमकर उपयोग किया जा रहा है इससे कंप्यूटर एडिक्शन, कॉरपल टनल सिंड्रोम, कंप्यूटर विजन सिंड्रोम, डिप्रेशन आदि अनेक परेशानियों से कंप्यूटर उपयोक्ता का सामना होना तय है। विभिन्न आयु वर्ग के बच्चे कंप्यूटर के आगे मॉनीटर की स्क्रीन पर आंखें गड़ाए अपनी पसंद के गेम खेलते रहते हैं, कार्टून या एनीमेशन फिल्में देखते रहते हैं या फिर अन्य कार्य करते रहते हैं। उनका बचपन आज कंप्यूटर के हवाले हो गया है। घर हो या स्कूल, बच्चों को बाह्य और आंतरिक रूप से कंप्यूटर ने बच्चों के व्यतित्व और दिनचर्या को बदलकर रख दिया है। जिन बच्चों को माता-पिता की व्यस्तता के कारण अधिकांश समय अकेले गुजारना पड़ता है उनके लिए कंप्यूटर ही एक अच्छा साथी सिद्ध होता है। यदि इंटरनेट कनेक्शन उपलब्ध हो तो सोने पर सुहागा।

कंप्यूटर गेम के लिए जॉय स्टिक या माउस का ही जमकर प्रयोग किया जाता है। रुचि का कार्य होने के कारण बिना हिलेडुले बच्चे निरंतर अपने काम में जुटे रहते हैं। लगातार माउस या जॉय स्टिक से एक ही क्रिया दुहराते रहने से उंगलियां थक जाती हैं। कंप्यूटर पर लगातार घंटों मॉनीटर पर नजरें गड़ाए उंगलियों से की बोर्ड पर काम करते रहने से उंगलियों की संवेदनशीलता में कमी आने लगती है जिससे मांसपेशियां कमजोर हाने लगती हैं। एक ही अवस्था में काफी देर तक बैठे रहने से पीठ दर्द की शिकायत होने तगती है। इसके साथ-साथ कंप्यूटर उपयोक्ता बांह मेज पर टिकी रहने से रक्त संचार और रीढ़ की हड्डी भी प्रभावित होते हैं। प्रायः कंप्यूटर उपयोग करने के लिए कुर्सी वयस्कों के अनुरूप बनी होती है, उसी बड़ी कुर्सी पर बैटकर बच्चे कार्य करते हैं। इस प्रकार बच्चों के पैर जमीन से ऊपर ही लटकी हुई अवस्था में रहते हैं। परिणामस्वरूप उनके पैरों में दर्द भी रहने लगता है।

कंप्यूटर पर काम करते रहने का सर्वाधिक असर आंखों पर पड़ता है। मेज की चौड़ाई का एक बड़ा भाग एक सामान्य मॉनीटर घेर लेता है जिससे मॉनीटर और उपयोक्ता की आंखों के बीच की दूरी काफी कम रहती है। प्रायः यह दूरी लगभग 40-50 सेमी। ही होती है। हां, एलसीडी मॉनीटर के उपयोग से यह दूरी बढ़ाई जा सकती है। एलसीडी मॉनीटर कुछ महंगा अवश्य है पर काफ़ी सुविधाजनक सिद्ध होता है। कंप्यूटर स्क्रीन पर लगातार नजरें गड़ाए रहने से आंखों पर खिंचाव पड़ने लगता है। उपयोक्ता बच्चा हो बड़ा, इससे उसकी आंखें अवश्य प्रभावित होती हैं। आंखों में जलन, निकट व दूर की चीजें देखने में असुविधा होना, थकान आदि परेशानियां सामने आती हैं। इससे गर्दन, कमर, पीठ, कलाई व बाजुओं में दर्द होना या बने रहना आदि व्याधियां सामने आती हैं।

कंप्यूटर पर प्रतिदिन 2-3 घंटे काम करते रहने पर प्रायः खास परेशानी नहीं होती। इससे अधिक समय लगातार काम करना परेशानी पैदा करता है। कम्यूटर हमारा अच्छा सहयोगी सिद्ध हुआ है पर अति हर बात की बुरी होती है। यानी इस पर जमकर काम करते रहना परेशानियों को न्यौता देता है। जानेमाने मनोचिकित्सक डॉ. संजीव सक्सेना के अनुसार जो लोग कंप्यूटर पर नियमित रूप से काफी समय निरंतर काम करते रहते हैं वे अकेलेपन के शिकार हो जाते हैं। वे अपने जीवन के वास्तविक आनंद से वंचित होने लगते हैं। कंप्यूटर पर लगातार काम करने की धुन, लगन, आदत, आवश्यकता, मजबूरी या आनंद का अनुभव करना और कंप्यूटर पर किसी दिन काम न कर पाना या अपेक्षाकृत कम समय काम कर पाना एक अलग प्रकार की परेशानी का अनुभव कराता है। इससे झुंझलाहट होना, दिनचर्या में अधूरापन अनुभव होना आदि से सामना होन के अलावा उपयोक्ता के सामान्य व्यवहार में भी बदलाव आ जाता है। ऐसी स्थिति व्यक्ति के लती या एडिक्ट होने की द्योतक है। कंप्यूटर एडिक्ट जब कंप्यूटर पर काम नहीं कर पाता तो वह परेशान होने लगता है। ज्यौं ही वह कंप्यूटर का उपयोग करने का अवसर मिलता है, स्वयं को किसी शहंशाह से कम नहीं समझता और कंप्यूटर छोड़कर जाने का उसका मन नहीं करता। इसके लिए उपयोक्ता अपने परिजनों, मित्रों, नियोक्ता आदि से झूठ बोलने से भी पीछे नहीं हटता।
टी.सी. चन्दर
सौजन्य: प्रभासाक्षी
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Wednesday, June 17, 2009

कार्टूनिस्ट

प्रतिभावान कार्टूनिस्टों का भविष्य सुनहरा है
कार्टूनिस्ट काक कहिन


कार्टूनिस्ट काक से कार्टूनिस्ट टी.सी. चन्दर की बातचीत

एक कार्टूनिस्ट होने के नाते कार्टून को आप कितना महत्वपूर्ण मानते है?
अगर आप अपनी चौबीस घंटों की दिनचर्या की वीडियो रिकॉर्डिंग करके रख दें। उसे कुछ समय बीतने के बाद आप देखें तो निश्चय ही आपको यह लगेगा कि आप हर क्षण को एक कार्टून की तरह ही जिए। आपकी हर भाव-भंगिमा, अभिव्यक्ति, विभिन्न क्रियाकलाप आदि निरर्थक ही नहीं थे अपितु उनमें से अधिकांश हास्यास्पद ही थे। आपकी गम्भीरता, प्रसन्नता, रुदन, क्रोध, खीझ, उदासी, आध्यात्मिकता, औरों के साथ आपका व्यवहार, आदि एक-एक कर आपके सामने आयेंगे और आपके व्यक्तित्व का मखौल उड़ाते दिखेंगे। जब सारी दिनचर्या ही कार्टूनी गतिविधियों से भरी हो तो कार्टून का अलग से महत्व खोजना बेमानी है। महत्व तो आयी-गयी चीज का होता है। अगर कार्टून बनाकर जीवन के क्रियाकलापों को कागज पर उतार सकें तो यह कार्य जीवन की जीवन्तता का प्रतीक बन जाता है। जीवन को देखने-संवारने का जितना काम कार्टून कला के माध्यम से हो सकता है उतना किसी और माध्यम से हो ही नहीं सकता।

कार्टून बनाने की प्रेरणा कैसे मिली?
बड़ा परिवार, पिता की बैठक में विभिन्न प्रकार के लोगों का आना-जाना, रिश्तों की विविधता और विस्तार, हर छोटे-बड़े के बीच परस्पर चलने वाले हास्य-व्यंग्य के प्रसंगों में कार्टून का बोध होता रहता था। अगर मामा के यहां गये तो पूरी बस्ती के बीच मामा-भांजे का रिश्ता कायम हो जाता था। भाई की ससुराल, अपनी ससुराल होती थी। साली-साले, सलहज, देवर, ननद, भाभी-इन सबके बीच मर्यादा को बरकरार रखते हुए कुछ भी कह लेने की छूट होती थी। मामा-मामी, बुआ-फूफा, चाचा-चाची आदि भी अपरोक्ष रूप से कटाक्ष करते ही थे, पूरे गांव-समाज का व्यवहार भी अपनत्व भरा खुलापन लिए होता था। लिहाजा कला की कॉपी में कार्टूनी आकृतियां बनाकर स्कूल में गुरूजी का ‘गुड’ पा लेने से कहीं कार्टून बनाने की शुरूआत हो गयी। पहला कार्टून एक अल्पजीवी दैनिक में छपा लेकिन वास्तव में शुभारम्भ कानपुर से प्रकाशित होने वाले लोकप्रिय अखबार दैनिक जागरण से हुआ।

अब कार्टूनिंग की क्या स्थिति है?
दरअसल सन् 1983 में जब मैं जनसत्ता में पहुंचा तो उस समय कार्टूनिंग बुझ-सी रही थी। आर.के. लक्ष्मण के कार्टूनों में भी वह बात नहीं आ पा रही थी। सुधीर दर कभी छपते थे, कभी नहीं। यहां तक कि कार्टून पहले पन्ने की जगह अन्दर के पन्नों पर छपने लगे थे। राजेन्द्र पुरी के कार्टूनों को हर अखबार छापने की जुर्रत नहीं करता था। अबू अब्राहम भी दिक्कत महसूस कर रहे थे। ’शंकर्स’ वीकली’ पहले ही बन्द हो चुकी थी। लिहाजा जब मैंने जनसत्ता में कार्टून बनाना शुरू किया तो हिन्दी-अंग्रेजी पत्रकारिता में अनुभव किया जाने लगा कि कार्टून के माध्यम से बहुत कुछ कहा जा सकता है और वह भी बिना कोई खतरा मोल लिए। जब कि सम्पादकीय, लेखों या रिपोर्टों के माध्यम से उतना नहीं कहा जा सकता। जनसत्ता के कार्टूनों का जिक्र होता तो हिन्दी के अखबार और कार्टूनों का वर्चस्व उजागर होता। तब अंग्रेजी अखबारों में कार्टूनों की फिर से तलाश शुरू हुई और हिन्दी अखबारों में शुरूआत। लगभग हर छोटे-बड़े हिन्दी अखबार में कार्टून को स्थान मिलने लगा। अनेक नये कार्टूनिस्ट सामने आये। पर संयोग, मेरे छपे कार्टूनों का तीखापन मेरी पहचान बनता गया। मेरे रिटायर होने के बाद ‘कार्टून’ के झंझट से मुक्ति पाने के लिए फिर अखबार सक्रिय हो गये। आज कैरीकेचर और कार्टूनी रेखांकन बनाने वालों की एक अच्छी पौध पनपी है पर देशकाल को कार्टून के माध्यम से प्रभावित करने वाली परम्परा फिर लुप्तप्राय होती जा रही है या यूं कहें कि दबा दी गयी है। कार्टून अन्दर के पन्नों पर पहुंचा दिया गया है। यह स्थिति अच्छी नहीं है। समाचार पत्र-पत्रिकाओं के मालिकों और सम्पादकों को कार्टून की लोकप्रियता और प्रभावशाली भूमिका को स्वीकार करते हुए उसे पर्याप्त महत्व देना ही चाहिए। मुझे आशा है कि स्थिति फिर बदलेगी।

कार्टूनों की सार्थकता को लेकर आप क्या कहेंगे?

राजनीतिक कार्टून ही सबकुछ नहीं हैं-वैसे जब तक बेबाक और सार्थक कार्टून जो राजनीतिक गतिविधियों को सही परिप्रेक्ष्य में लाने में सक्षम न हों तब तक राजनीतिक कार्टूनों की को प्रासंगिकता भी नहीं है। जीवन को पूर्णता के साथ कार्टून के माध्यम से देखा जा सकता है, इसके अलावा और रास्ते भी खुलते हैं। प्रचार-प्रसार, प्रेरक संदेश, शुष्क पाठ्य सामग्री में एकरसता तोड़ने और समझने में सहायक कार्टून, कार्यालयों, अस्पतालों, रेलवे स्टेशनों, बैकों, सेना, सार्वजनिक स्थानों में ही नहीं जहां नजर जाती है वहां कार्टून अपनी प्रभावशाली भूमिका निभा सकते हैं। बस सवाल उनके उपयोग के लिए मन बनाने का है। कार्टून समाज की प्रगति और जीवन्तता को दर्शाते हैं। अच्छे कार्टून उस भाषा और समाज को दर्पण दिखाने का काम करते हैं और उसकी प्रगति भी बताते हैं।

नये कार्टूनिस्टों के लिए आमदनी की दृष्टि से यह क्षेत्र कैसा है?
मौजूदा हालात में अखबार ही कार्टूनों के प्रस्तुतीकरण का एकमात्र सही माध्यम हैं और माध्यम भी अब अपना रूप बदल चुका है यानी कार्टून के लिए नकारात्मक भूमिका तैयार है। इससे कार्टूनिस्ट की भूमिका भी गौण हो चुकी है। इस तरह बहुत ज्यादा आमदनी का दौर अभी भी शुरू नहीं हुआ है पर कार्टूनों की उपयोगिता का दायरा अवश्य बढ़ा है, अनेक पत्र-पत्रिकाएं अब भी महत्व के साथ कार्टून छाप रही हैं। खास तौर पर विजुअल मीडिया में नये दरवाजे खुले हैं। कम्प्यूटर का उपयोग बढ़ा है। नयी तकनीक ने नयी राहें खोली हैं। एनीमेशन का विशाल संसार हमारे सामने है। कम्प्यूटर और एनीमेशन की इस नयी तकनीक को जानने-समझने-अपनाने के प्रति नयी पीढ़ी आकर्षित हुई है। हमारे देश में एनीमेशन का कार्य निरन्तर विस्तार पा रहा है। अगर जीवन को गहराई जानने वाले और नयी तकनीक में पारंगत नये कार्टूनिस्टों की पौध लगायी जाए तो विदेशी मुद्रा का अकूत भंडार भारत की झोली में आ सकता है। हालांकि इस ओर काफी प्रयास चल भी रहे हैं। प्रतिभावान कार्टूनिस्टों के लिए सुनहरा भविष्य इंतजार कर रहा है। एक अच्छे कार्टूनिस्ट के लिए जन्मजात प्रतिभा और रुचि अधिक उपयोगी सिद्ध होती है। पर किसी में कला और कार्टून कला के प्रति थोड़ी रुचि हो तो भी उसे सही प्रशिक्षण और अभ्यास से निपुण बनाया जा सकता है। नये कार्टूनिस्ट जीवन को निकट से बारीकी से देखें, समझें और यह देखें कि कार्टून के माध्यम से क्या कुछ नया जोड़ सकते हैं, उसके प्रति ईमानदारी से प्रयास करें गुदगुदाने के साथ-साथ व्यक्तित्व में निखार लाने को प्रेरित करने वाले कार्टूनों की हर कदम पर सदा जरूरत बनी रहती है।

कार्टूनिस्ट होते तो?
कार्टूनिस्ट न होते तो अच्छी-खासी सरकारी नौकरी करते हुए रिटायर होते। पर नहीं, मेरे लिए यह कैरियर का सवाल नहीं था, बल्कि कैरियर के रूप में कार्टूनिंग को अपनाना एक पागलपन-सा लगता था। मैं कार्टूनिंग को पूरी तरह अंगीकार करने के मामले में बीस साल इंतजार करता रहा। दरअसल मेरा जीवन कहीं विकराल विडम्बनाओं से घिर गया था और लग रहा था जैसे मेरे लिए जीवन का कोई अर्थ ही न हो। जब दैनिक जागरण के संपादक स्वर्गीय नरेन्द्र मोहन ने 6 जुलाई 1967 को मेरा बनाया पहला कार्टून छापा तो अनायास ही मैं अपना जीवन नहीं, कार्टूनिंग जीने लगा। बकौल लखनऊ के तेजतर्रार पत्रकार विनोद शुक्ल के, अगर जीवन में सब कुछ ठीक-ठाक होता तो आप काक न होते।
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कार्टूनिस्ट चन्दर

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Saturday, May 23, 2009

बनें कार्टूनिस्ट

छुट्टियों में बन जाएं      कार्टूनिस्ट

सामान्यतः कार्टून दो प्रकार के होते हैं-मूक और सवाक या सम्वाद सहित। मूक कार्टून में किसी घटना या प्रसंग की रोचक प्रस्तुति देखने वाले को हंसा देती है। ऐसा सवाक कार्टून अच्छा माना जाता है जिसमें संवाद और चित्र एक-दूसरे के पूरक हों।
कार्टून बनाना आनन्द देने वाली कला है, जिसे सीखना बहुत आसान है। नियमित अभ्यास और मार्गदर्शन से आप स्वयं इस कला में पारंगत हो सकते हैं। तरह-तरह के चेहरे और नैन-नक्श बनाने का अभ्यास करें। अधिकांश बड़े कार्टूनिस्ट इसी प्रकार सफल हुए हैं।

सामग्री- साधारण सफेद कागज या न्यूजप्रिण्ट पेपर की स्कैच बुक, बी या 2बी नम्बर की मुलायम काली पेंसिल या क्लिक पेंसिल, अच्छी रबड़ और साफ मुलायम कपड़े का टुकड़ा लें। अब हलके हाथ से सबसे पहले आड़ी, खड़ी और विभिन्न कोणों पर मुड़ी, तिरछी और सीधी रेखाएं खींचने का खूब अभ्यास करें। फिर गोलाकार या वक्र रेखाएं खींचें। पेंसिल से किये गये इस अभ्यास को बाद काली वाटर प्रूफ स्याही, निब-होल्डर, ब्रश (1, 2 व 3 नम्बर), ड्रॉइंग पेन, बो पेन, क्रोक्विल, रैपिडोग्राफ (.3, .4 या .5 नम्बर), आदि में से 1-2 या सभी से यही अभ्यास करें पेंसिल, होल्डर या पेन कभी कसकर न पकड़ें और न ही कागज पर अधिक दवाब डालकर या गड़ाकर चलाएं।

चेहरे बनाएं- आमतौर पर सबके चेहरों की बनावट एक-दूसरे से भिन्न होती है। आरम्भ में गोल, अण्डाकार आदि चेहरे बनाने का अभ्यास करें। आंख, कान, मुंह आदि बनाएं। चेहरों को साइड पोज और विभिन्न कोणों से भी बनाएं। इसके लिए हलके हाथ से निर्देश रेखाएं भी खींचें। इन चेहरों पर मुस्कान, दुःख, हंसी, गुस्सा, खिसियाहट, आश्चर्य, शरारत, डर आदि भाव लाएं। ये भाव 1-2 रेखाओं के द्वारा आसानी से दिखाए जा सकते हैं। मूंछ, दाढ़ी, बाल, तिलक, चश्मा, तिल, मस्सा, पगड़ी आदि पहचान या प्रतीक चिह्न भी बनाएं।

अपने आसपास के लोगों, वस्तुओं, दृश्यों आदि को ध्यान से देखने की आदत डालें। इनको देखकर और बाद में स्मृति के आधार पर बनाने का अभ्यास करें। कार्टून बनाने के साथ-साथ वास्तविक चित्रण का अभ्यास (स्कैचिंग) भी करते रहें। ये कार्य कार्टून बनाने में उपयोगी सिद्ध होंगे।
निर्देश रेखाएं- चेहरा, पूरी आकृतियां और सभी वस्तुओं, उनकी गतिशीलता के चित्रण में निर्देश रेखाएं महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। ये रेखाएं बहुत हलके हाथ से खींचनी चाहिए ऐसा करने से कार्टून को अन्तिम रूप देने के बाद इन्हें रबड़ से मिटाने में आसानी होगी। निर्देश रेखाओं के उपयोग से आप अपने पात्रों की सही वेशभूषा और अन्य वस्तुएं भी अच्छी तरह बना सकते हैं। कार्टून में एक से अधिक पात्र साथ-साथ बनाने पर उनके सही आकार व बनावट का ध्यान रखना चाहिए। ऐसा न हो कि बच्चा पिता से बड़ा बने या हाथी से बड़ा कुत्ता दिखे।

सामान्यतः कार्टून दो प्रकार के होते हैं-मूक और सवाक या सम्वाद सहित। मूक कार्टून में किसी घटना या प्रसंग की रोचक प्रस्तुति देखने वाले को हंसा देती है। ऐसा सवाक कार्टून अच्छा माना जाता है जिसमें संवाद और चित्र एक-दूसरे के पूरक हों। कार्टून के लिए सही आकार का बॉक्स या आयत बनाकर उसके ऊपरी भाग में सम्वाद की जगह छोड़, उसमें रेखाएं खींचकर पेंसिल से सम्वाद लिख दें। फिर निर्देश रेखाओं के उपयोग से पात्र, उनके उचित हावभाव, पहनावा, दृश्य आदि बनाएं। फिर काली स्याही, पेन, होल्डर, ब्रश, या रेपिडोग्राफ का उपयोग कर कार्टून को अन्तिम रूप दें। स्याही सूखने पर पेन्सिल की रेखाओं को हलके हाथ से रबड़ से मिटा दें। कार्टून में काली स्याही से बनी अनावश्यक रेखाओं को मिटाने या ठीक करने के लिए सफेद या सुपर व्हाइट पोस्टर
कलर और ब्रश का उपयोग करें।

कार्टून का आकार- छपे हुए कार्टून मूल रूप से 2, 4 गुना या अधिक बड़े बनाये जरते हैं। इससे कार्टून साफ और अच्छे दिखते हैं तथा कार्टूनिस्ट को काम करने में सरलता होती है। इसी प्रकार आप कार्टून, कार्टून स्ट्रिप, कॉमिक आदि के लिए सही आकार का आयत या वर्ग बना सकते हैं। इसके चारों ओर 1.5 से.मी. खाली छोड़कर बाकी स्थान स्टील के स्केल और कटर या ब्लेड से काटकर अलग कर दें।

कार्टून स्ट्रिप और कॉमिक- आमतौर पर कार्टून स्ट्रिप में 2, 3 या 4 बॉक्स होते हैं और कॉमिक के एक पृष्ठ में 4, 6, 8 या 10 बॉक्स या दृश्य होते हैं। कॉमिक और कार्टून स्ट्रिप में कहानी व सम्वाद के अनुसार समानता लिए हुए पात्र, दृश्य आदि अलग-अलग कोणों से से क्रमवार ढंग से बनाए जाते हैं।

रंगीन कार्टून- कार्टून को अंतिम रूप देने के बाद मूल प्रति या उसकी फोटो
प्रति में सही रंग भरे जाते हैं। छपने पर अच्छे परिणाम के लिए फोटो कलर भरे जाते हैं। वाटर कलर, पेस्टल कलर, पोस्टर कलर आदि का उपयोग भी किया जाता है। कार्टून स्कैन कर उनमें कम्प्यूटर से भी रंग भरे जाते हैं। इसके लिए कम्प्यूटर के उपयोग का प्रशिक्षण ले लेना चाहिए।
अब देर किस बात की, कीजिए शुरूआत!
यहां क्लिक करें और देखें-
कार्टूनपन्ना, कार्टूनकाल, मुस्कानदूत



छुट्टियों में बन जाएँ कार्टूनिस्ट
बाल पत्रिका नंदन में प्रकाशित


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कार्टून इंस्टीट्यूट झांकी

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